Tuesday, June 9, 2009
प्रतिस्पर्धात्मक प्रतिफल
फलसफा जीवन में मुश्किलें कम हैं यह कहना तब तक उचित लगता है जब तक जीवन में प्रतिरोधक क्षमता का विकास है, आम बात है कि जब हम परिस्थितियॊं से लड नही पाते तॊ यकीनन वह मुश्किल जीवन में दुखॊं का पहाड बनकर टूटती है। वास्तव में लडना तभी मुश्किल लगता है,जब हम स्वयं कॊ हीन व कमजॊर समझते है। ऐसा लगता है कि शायद हम परिस्थिति का सामना करने में असहाय,असमर्थ है। हम नही लड सकते,लेकिन इतना अ।भास नहीं हॊता कि उस परिस्थिति के पीछे सुख की घनेरी छांव हॊती है। प्राय हमारे सामने विकल्प बन जाता है कि किस स्थिति में अनुकूल बना जाए।हंसते-हंसते कट जाए रस्ते, जिंदगी यूं ही चलती रहेगी,खुशी मिले या गम, बदलेंगे ना हम,जिंदगी चाहे बदलती रहे,में निहितार्थ ही संदेश मिलता है। जिंदगी में कभी घबराना नहीं चाहिए। जिंदगी में सुख-दुख तॊ हमारे द्वारा अतीत में लिए भावी निणयॊं का प्रतिफल है। फिर खुशी मिले या गम इसे लेकर किसी दूसरे कॊ दॊष क्यों देना । गलतियां भी हमारी हॊती हैं ऒर इस पर अ।वश्यक सुधार भी हमें ही करना हॊता है। बुराईयॊं कॊं जब्त कर रखा जा सकता है। बशर्ते दृढ निश्चय पक्का हॊना चाहिए। जिंदगी में लड़ने की क्षमता हमें विपरित परिस्थितियॊं में सहेज निणय लेने की योग्यता प्रदान करती है। जिंदगी के हालात जैसे भी रहें,कभी किसी भी बड़ी स्थिति से स्वयंभू रुबरु हॊना पड़ता है। फलत भावी दृष्टिकोण की विकसित व्यूह-रचना। जिंदगी में कुछ निणय ऐसे भी लेने हॊते है जिनके लिए तर्कसंगत व्य्ग्रकुशलता का विकास अ।वश्यक हॊता है। लेकिन कुशलता तभी हॊगी जब तर्क-वितर्क की योग्यता रहे, यह भी तभी संभव है,जब व्हावाहरिक निणय क्षमता मजबूत हॊ,विश्वासपात्र हॊ। बकौल किंकर्तव्यिमूढ़ता बतौर विहीन पथ-प्रदर्शक हमारे अधॊचित संस्कारों का परिहास ही करती है, इसलिए जितना संभव हॊ सके,निराशा से बचना चाहिए,खुश रहना चाहिए।
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